समुद्र के खारे पानी को अब बेहद कम लागत और सीमित संसाधनों के जरिए उपयोगी बनाने का रास्ता खुल गया है। आईआईटी इंदौर के एक प्रोफेसर और उनकी टीम ने एक अभिनव तकनीक, इंटरफेशियल सोलर स्टीम जनरेशन (आईएसएसजी), विकसित की है, जो पर्यावरण के लिहाज से भी लाभकारी मानी जा रही है।
मीठे पानी की बढ़ती मांग का समाधान
आईएसएसजी तकनीक को मीठे पानी की वैश्विक मांग को पूरा करने की दिशा में क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है। इसमें समुद्री जल को खारमुक्त करने के लिए सौर ऊर्जा का उपयोग किया जाता है। इस तकनीक को आईआईटी इंदौर के प्रोफेसर रूपेश देवन और उनकी टीम ने विकसित किया है। इसमें सौर ऊर्जा को उन्नत फोटोथर्मल सामग्री के साथ संयोजित किया गया है, जिससे खारे पानी को किफायती तरीके से शुद्ध किया जा सके।
नई सामग्री से सौर ऊर्जा का बेहतर उपयोग
पारंपरिक कार्बन आधारित फोटोथर्मल पदार्थों की हाइड्रोफोबिसिटी जैसी समस्याओं को हल करने के लिए टीम ने मेटल ऑक्साइड और कार्बाइड आधारित एक विशेष इंक विकसित की है। यह इंक सौर विकिरण को प्रभावी ढंग से अवशोषित करके गर्मी में बदलती है, जिससे बिना किसी बाहरी ऊर्जा स्रोत के खारे पानी को सीधे भाप में परिवर्तित किया जा सकता है।
उच्च वाष्पीकरण दर का लक्ष्य
प्रोफेसर देवन के अनुसार, इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य एक सस्ती और प्रभावी जल शोधन विधि विकसित करना था। मेटल ऑक्साइड आधारित इंक का उपयोग करते हुए उच्च वाष्पीकरण दर प्राप्त की गई है, जो इस तकनीक की कार्यक्षमता साबित करती है। यह विधि विशेष रूप से उन दूरस्थ और तटीय क्षेत्रों के लिए आदर्श है, जहां पारंपरिक ऊर्जा संसाधन दुर्लभ हैं।
पर्यावरण-अनुकूल और सरल प्रक्रिया
आईआईटी इंदौर के निदेशक प्रोफेसर सुहास जोशी ने बताया कि आईएसएसजी तकनीक एक सरल और ऊर्जा-कुशल विकल्प है। सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आने पर फोटोथर्मल सामग्री तेजी से गर्म होती है, जिससे पानी वाष्पित हो जाता है और लवण व अन्य प्रदूषक अलग हो जाते हैं। इस वाष्प को शुद्ध पानी में संघनित किया जाता है, जिससे यह प्रक्रिया पर्यावरण के अनुकूल और कुशल बन जाती है।
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