इंदौर: तीसरे नेशनल हिप कोर्स और इंडोकॉन 2026 के दूसरे दिन ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में वैज्ञानिक सत्रों ने हिप प्रिज़र्वेशन, डिस्प्लेशिया तथा हिप से जुड़े जटिल मामलों के आधुनिक उपचारों पर केंद्रित रहे। देश-विदेश से आए विशेषज्ञों ने हिप फ्रैक्चर, गर्दन व ट्रोकेन्टर क्षेत्र की चुनौतियों तथा आम मरीजों में बढ़ती जोड़ संरचनात्मक गड़बड़ियों पर महत्वपूर्ण प्रेज़ेंटेशन दिए। आयोजन चेयरमैन डॉ. हेमंत मंडोवरा के नेतृत्व में ये सत्र युवा सर्जनों को हिप प्रिज़र्वेशन, नई तकनीकों व व्यावहारिक प्रशिक्षण में नई दिशा दे रहे हैं।
दिन की शुरुआत इन्फेक्शन मॉड्यूल से हुई, जिसमें पोस्ट-ऑपरेटिव संक्रमण, ‘द वर्ल्ड ऑफ माइक्रोब्स’ तथा हड्डी संक्रमण की जटिलताओं पर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने फ्रैक्चर संबंधी संक्रमण (एफआरआई) व कृत्रिम जोड़ संक्रमण (पीजेआई) के अंतर व प्रबंधन को सरल भाषा में समझाया। इसके बाद फीमरल नेक, ट्रोकेन्टर व ओस्टियोनेक्रोसिस मॉड्यूल में केस स्टडी, लाइव वीडियो व पॉइंटर टॉक के ज़रिए आधुनिक तकनीकों की जानकारी साझा की गई।
दोपहर का हिप प्रिज़र्वेशन सत्र सबसे बड़ा आकर्षण रहा। इंग्लैंड से डॉ. अजय मालवीया ने बताया कि युवा मरीजों में हिप असहजता, चलने की परेशानी व मूवमेंट रुकावट का मुख्य कारण डिस्प्लेशिया या बॉल-एंड-सॉकेट जोड़ की असमानता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जॉइंट के बॉल व सॉकेट के मेल न खाने से टकराव होता है, जो दबाव बढ़ाकर आर्थराइटिस का कारण बनता है। हिप प्रिज़र्वेशन तकनीक ऐसे मामलों में जोड़ को लंबे समय तक कार्यशील रखती है, खासकर जब रिप्लेसमेंट की तत्काल ज़रूरत न हो। डिस्प्लेशिया, लैबरल समस्या व कैम-पिंसर इम्पिंजमेंट में यह भविष्य के बड़े ऑपरेशन को टाल सकती है, विशेषकर युवा व सक्रिय मरीजों के लिए।

नागपुर के वरिष्ठ ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. सुश्रुत बाभुलकर ने चिंता जताई, “पोस्ट-कोविड काल में हिप आर्थराइटिस के केस 25-30% बढ़े हैं। बिना चोट के युवा मरीज आ रहे हैं। हिप प्रिज़र्वेशन उन्हें बड़े ऑपरेशन से बचा सकती है।” ऐसे सत्र युवा सर्जनों को आधुनिक तकनीक व वास्तविक केस की गहन समझ देते हैं।
गुजरात के हिप-पेल्विक विशेषज्ञ डॉ. कश्यप ने कहा कि दवाओं के ओवरडोज़ व अत्यधिक अल्कोहल से हिप जोड़ की रक्त-आपूर्ति प्रभावित हो रही है। “समय पर जांच व प्रिज़र्वेशन से बड़े ऑपरेशन टाले जा सकते हैं। प्रारंभिक बॉल-सॉकेट मिसमैच की पहचान जोखिम कम करती है।”
दिनांत स्किल लैब में प्रतिभागियों ने एसीटैबुलर तैयारी, एंगल ब्लेड प्लेट व 3डी हिप तकनीकों का अभ्यास किया, जिसे उन्होंने अत्यंत उपयोगी बताया।
तीसरा दिन: हिप सर्जरी के उन्नत विषयों पर केंद्रित रहेगा। शुरुआत पेरी-इम्प्लांट व पेरी-प्रोस्थेटिक फ्रैक्चर मॉड्यूल से होगी, जिसमें जटिल केस, रीकरेन्ट डिसलोकेशन, सीमेंटेड टीएचए व रिविजन सर्जरी के सिद्धांत शामिल होंगे। डिबेट में वृद्धों के पाउवेल्स टाइप-2 फ्रैक्चर पर फिक्सेशन बनाम रिप्लेसमेंट चर्चा होगी। अंतिम सत्र में सिकल सेल रोग में हिप आर्थ्रोप्लास्टी, स्पाइन-पेल्विक संबंध, पाउवेल्स ऑस्टियोटॉमी व रोचक केस चर्चाएँ होंगी।
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