इंदौर जिले में पारंपरिक मछली पालन को आधुनिक तकनीक से जोड़ते हुए ‘केज कल्चर’ (Cage Culture) पद्धति को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस पहल से न केवल मत्स्य उत्पादन में वृद्धि होगी, बल्कि स्थानीय लोगों को स्वरोजगार के नए अवसर भी मिलेंगे। जिला पंचायत ने इस योजना के लिए यशवंत सागर, बिलावली और चोरल तालाब का चयन किया है, जहां लगभग 200 फ्लोटिंग जाल (पिंजरे) लगाए जाएंगे।
चोरल तालाब में पहले से कुछ क्षेत्रों में केज कल्चर से मछली पालन हो रहा है, जिसे अब और विस्तार दिया जाएगा। वहीं, यशवंत सागर और बिलावली तालाब में यह योजना बारिश के मौसम के बाद शुरू की जाएगी। योजना के तहत जिला पंचायत और मत्स्य विभाग मिलकर पिंजरे लगाने की अनुमति प्रदान करेंगे। योजना को लागू करने के लिए तालाबों की गहराई, सालभर जल उपलब्धता और सुगम पहुंच जैसी सुविधाओं को ध्यान में रखा गया है।
मत्स्य पालन विभाग के सहायक संचालक डी.एस. सोलंकी के अनुसार, कोई भी इच्छुक व्यक्ति केज कल्चर पद्धति से मछली पालन कर सकता है, हालांकि इसमें किसी प्रकार का सरकारी अनुदान नहीं मिलेगा। एक व्यक्ति अधिकतम 18 पिंजरे लगाने की अनुमति प्राप्त कर सकेगा, और तालाब के कुल क्षेत्रफल का सिर्फ 1% हिस्सा इस पद्धति के लिए उपयोग किया जाएगा।
इस योजना में लगभग 3 लाख रुपये प्रति व्यक्ति का निवेश आवश्यक होगा—जिसमें से 1.5 लाख रुपये पिंजरे के निर्माण और शेष मछली बीज व आहार पर खर्च किए जाएंगे। चोरल के बाद अब यशवंत सागर और बिलावली तालाबों में भी इस तकनीक को अपनाने की तैयारी की जा रही है।
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