इंदौर। ‘संजा’ शब्द संध्या का ही एक लोक रूप है। कुंवारी कन्याएं इसे मंगलदायी देवी के रूप में अपने कौमार्य की सुरक्षा और मन के अनुकूल वर की प्राप्ति की इच्छा से मनाती हैं। मालवा-निमाड़ की लोक-परंपरा श्राद्ध पक्ष के दिनों में कुंआरी लड़कियां मां पार्वती से मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए पूजन-अर्चन करती हैं। उक्त बातें पर्यावरणविद स्वप्निल व्यास ने मालवमंथन द्वारा संदेशों की ‘संजा’ संध्या कार्यक्रम ग्राम बुढ़ानिया में कही।
व्यास ने बताया की संजा मनाने की यादें लड़कियों के विवाहोपरांत गांव-देहातों की यादों में हमेशा के लिए तरोताजा बनी रहती हैं और यही यादें उनके व्यवहार में प्रेम, एकता और सामंजस्य का सृजन करती हैं। संजा सीधे-सीधे हमें पर्यावरण व अपने परिवेश से जोड़ती है,और यही भाव से मालवमंथन हर वर्ष संदेशों की संजा का आयोजन करता है। जिसका उद्देश्य मालवा की लोकसंस्कृति,मालवी लोकगीतों व उनमें छुपे पर्यावरण संरक्षण के मौलिक भाव को आज के आधुनिक समाज मे जीवित रखना है।
कार्यक्रम की आयोजक बीना राजवंशी ने बताया कि यहां बालिकाओं व गांव की महिलाओं ने परंपरागत संजा उकेरी एवं पूजा-आरती के साथ संजा के परंपरागत मालवी गीत गए। स्मृति आदित्य ने बालिकाओं को संजा से जुड़ी सामाजिक, पारंपरिक व व्यवहारिक विशेषताएँ बताई। संजा बनाने वाली प्रतिभागियों में नंदिनी राठौर, अक्षरा पवार, हिना पवार, महिमा सोनानी, जया पवार, दिव्या जाटव सहित कई लोग मौजूद थे।
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