इंदौर के व्यवसायी दिलीप सोनी की कहानी दर्शाती है कि सरकारी विभाग की गलती किस तरह एक परिवार की जिंदगी तबाह कर सकती है। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक फैसले ने पासपोर्ट विभाग की मनमानी कार्यवाही पर प्रकाश डाला है।
सोनी की 200 करोड़ रुपये टर्नओवर वाली कंपनी, सोनी सोया प्राइवेट लिमिटेड, पासपोर्ट विभाग की गलती के कारण बर्बाद हो गई। उनकी सारी संपत्ति या तो बिक गई या जब्त कर ली गई। लगभग ढाई साल तक, सोनी और उनका परिवार इस गलती का खामियाजा भुगतता रहा।
यह सब एक छोटे से विवाद से शुरू हुआ, जहां एक कंपनी ने सोनी के खिलाफ चेक बाउंस का मामला दर्ज किया। हालांकि, सोनी का दावा है कि उन्हें उस कंपनी से और अधिक राशि मिलनी थी। कोर्ट के नोटिस सही पते पर नहीं भेजे गए, जिससे सोनी अपना पक्ष नहीं रख पाए।
सोनी ने पासपोर्ट विभाग में जमानत के कागज़ जमा किए और पासपोर्ट अनब्लॉक करने की गुजारिश की। कानूनन पासपोर्ट विभाग के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है कि समन के खिलाफ पासपोर्ट ‘जब्त’ किया जाए। लेकिन पासपोर्ट विभाग ने सोनी की एक ना सुनी। पासपोर्ट विभाग ने बिना किसी वैध कारण के सोनी का पासपोर्ट ब्लॉक कर दिया। यह कदम अवैध था, क्योंकि विभाग के पास ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं था। इस कारण, सोनी अमेरिका नहीं जा सके, जहां उनका मुख्य व्यवसाय था।
ढाई साल पासपोर्ट हासिल करने के इस फिजूल के झमेले में उनकी पूरी जिंदगी बर्बाद हो गई। दिलीप का पूरा काम भारत-अमेरिका की ट्रैवलिंग पर निर्भर करता था। लंबे समय वे अमेरिका नहीं जा पाए, जिसके कारण उन्हें वहां अपना व्यवसाय बंद करना पड़ गया। उनकी जमी-जमाई साख और कंपनी (सोनी सोया प्रोडक्ट) बंद हो गई। यूएसए सरकार ने कोविड के कारण हुए नुकसान से उबरने के लिए 20 लाख अमेरिकी डॉलर का ऋण मंजूर किया था।
उनके खाते में 392900 अमेरिकी डॉलर डाल भी दिए गए। लेकिन दिलीप समय पर नहीं पहुंच पाए और राशि वापस चली गई। लोन कैंसिल हो गया। इस दौरान अमेरिकी सरकार ने उन पर 250 प्रतिशत की ड्यूटी लगा दी। इस घटना के परिणामस्वरूप, सोनी की कंपनी अमेरिका में बंद हो गई। वे कोविड राहत ऋण का लाभ नहीं उठा पाए, और उन पर भारी जुर्माना लगाया गया। भारत में भी, उनकी कंपनी ऋण के बोझ तले दब गई। उनकी अधिकांश संपत्ति बैंकों द्वारा जब्त कर ली गई।

इस त्रासदी का असर सोनी के परिवार पर भी पड़ा। उनकी मां का निधन हो गया, खुद सोनी को हार्ट अटैक आया, और उनके बच्चों की पढ़ाई बाधित हुई। आज, सोनी अपने व्यवसाय को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सफलता अभी दूर है।
अंततः, लगभग ढाई साल बाद, पासपोर्ट विभाग ने अपनी गलती स्वीकार की और अदालत ने सोनी के पक्ष में फैसला सुनाया। अब सोनी पासपोर्ट विभाग से मुआवजे की मांग कर सकते हैं, लेकिन विभाग ने अभी तक इस मांग को स्वीकार नहीं किया है।
यह कहानी दर्शाती है कि सरकारी विभागों की लापरवाही कैसे नागरिकों के जीवन को प्रभावित कर सकती है, और न्याय प्राप्त करने में कितना समय लग सकता है।
Thank you for reading this post!

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First of all thanks very much to posted my story. You have published it perfectly.
Dilip Soni