कई शहरवासियों को अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि बीआरटीएस को तोड़ने का निर्णय आखिर किन आधारों पर लिया गया। न तो इस मुद्दे पर जनप्रतिनिधियों के साथ कोई औपचारिक चर्चा हुई और न ही जनता के बीच इसे लेकर स्पष्ट जानकारी साझा की गई। इंदौर में बीआरटीएस निर्माण में जहां दोगुना समय लगा था, वहीं अब इसे हटाने की प्रक्रिया भी सुस्त गति से चल रही है। नगर निगम द्वारा नियुक्त ठेकेदार काम में तेजी नहीं ला पा रहा है, सोमवार को भी काम पूरी तरह बंद रहा। इसी बीच, निगम अधिकारियों को कोर्ट की नाराजगी का सामना भी करना पड़ रहा है।
अधिकारियों ने अदालत के सामने पंद्रह दिन में रैलिंग हटाने का आश्वासन दिया है, जबकि वास्तविकता यह है कि रैलिंग हट जाने के बाद भी बस लेन का उपयोग वाहन चालकों के लिए संभव नहीं होगा, क्योंकि दोनों लेन की चौड़ाई अलग-अलग है। ऐसे में दुर्घटनाओं की आशंका बनी रहेगी। लेन को एक समान करने के लिए पेचवर्क जरूरी होगा, जबकि नए सेंट्रल डिवाइडर के निर्माण में चार से छह महीने का समय लग सकता है। इससे चौड़ी सड़क की सुविधा के लिए वाहन चालकों को और इंतजार करना पड़ेगा।
शहरवासी यह भी समझ नहीं पा रहे कि बीआरटीएस हटाने का फैसला अचानक क्यों लिया गया। नौ माह पहले एयरपोर्ट पर मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मीडिया के सामने इसके हटाने की बात कही थी, जिसके बाद नगर निगम ने कोर्ट से इसकी अनुमति मांगी। यह स्थिति तब है जब मुख्यमंत्री ने ही अपनी पहली इंदौर यात्रा में बीआरटीएस पर एलिवेटेड ब्रिज के निर्माण का भूमिपूजन किया था। हालांकि सर्वे में कम ट्रैफिक सामने आने पर उस योजना को रोक दिया गया। अब बीआरटीएस के प्रमुख जंक्शनों पर ब्रिज निर्माण की तैयारी की जा रही है।
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